Kabir Ke Dohe in Hindi Pdf | कबीर के दोहे हिन्दी PDF

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Kabir Ke Dohe in Hindi Pdf- प्रिय पाठकों! इस पोस्ट में, मैं Kabir Ke Dohe in Hindi Pdf साझा करूंगा। आप इसे पीडीएफ प्रारूप में डाउनलोड कर सकते हैं। तो इस लेख को पढ़ना जारी रखें। कबीर दास जी एक महान निर्गुण भक्त उपाशक थे उन्होंने बहुत सारे दोहे और पुस्तके लिखी है जिनमे से कुछ दोहे निचे विस्तृत रूप से वर्णित किये गए है, जो निम्नलिखित है :-

(Kabir Ke Dohe in Hindi Pdf) कबीर दास 15 वीं सदी के सबसे महान क्रांतिकारी व्यक्ति थे। उन्होंने अपनी कविताओं और दोहों के माध्यम से समाज में कई बदलाव लाने की आशा की। Kabir Ke Dohe in Hindi Pdf आज भी पूरी दुनिया में मशहूर हैं। आज हम कबीर दास के दोहे पढ़ेंगे।

Kabir Ke Dohe in Hindi Pdf

वह जो संदेश दोहों के माध्यम से व्यक्त करना चाहते थे, वह आज भी हमारे साथ है। कबीर ने अपने दोहों के माध्यम से जातिगत भेदभाव को खत्म करने की आशा की। परिणामस्वरूप, हम कबीर के दोहे में जाति और जाति भेद से संबंधित विभिन्न उपाख्यानों का सामना करेंगे। इस लेख में, हमने कबीर के दोहों के हिंदी अनुवादों को शामिल किया है। Kabir Ke Dohe in Hindi Pdf Download

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Kabir Ke Dohe in Hindi Pdf with meaning

:::कबीर के दोहे:::

1.दुख में सुमरिन सब करे, सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, दुख कहे को होय।।

अर्थ – दुखी होने पर सभी भगवान को याद करते हैं, लेकिन क्या आपने कभी खुश रहते हुए भगवान को याद किया है? अगर आप खुश होने पर भगवान को याद करते हैं, तो आप कभी दुखी नहीं होंगे। Kabir Ke Dohe in Hindi Pdf

02. लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट।
पीछे फिर पछ्ताओगे, प्राण जाहि जब छूट।।

अर्थ – यहाँ भगवान को राम नाम से दर्शाया गया है, और कबीरदास कहते हैं कि हम दुःख में भगवान को उसी भक्ति से याद करते हैं जैसे हम उन्हें आनंद में याद करते हैं। सुखी होने पर भी ईश्वर को उसी भाव से याद करने से कोई दु:ख नहीं होगा।

03. जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

अर्थ: महँ संत कबीर दस जी इस दोहे के माध्यम से यह बताना चाहते है कि व्यक्ति को किसी सज्जन मनुष्य कीकभी जाति पूछकर उसका अपमान न करे, बल्कि उस मनुष्य के ज्ञान को पहचानो और उससे ज्ञान प्राप्त करो, जैसे कि म्यान के अंदर रखी तलवार की कीमत होती है म्यान की नहीं होती उसी तरह उस मनुष्य के ज्ञान का आदर करो, उसकी जाति कभी मत पूछो।

04. अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।
(Kabir Ke Dohe in Hindi Pdf)

अर्थ: इस दोहे का मध्यम से लोगो को ये सन्देश देना चाहते है कि जरूरत से ज्यादा बोलना अच्छा नहीं हॉट है और न ही जरूरत से ज्यादा शांत रहना अच्छा होता है जैसे कि बहुत ज्यादा वर्षा होना अच्छी नहीं होती है और न ज्यदय धुप अच्छी होती है। इसलिए लोगो को न ज्यादा बोलना चाहिए और न ही ज्यादा चुप रहना चाहिए।

05. दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार,
तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।

अर्थ: कबीर दस जी ने इस दोहे में यह बताने कि कोशिश की है कि लोगो को होने मनुष्य जीवन का अच्छी प्रकार से उपयोग करना चाहिए क्योंकि मनुष्य का जन्म पाना बहुत ही मुश्किल है जिस तरह वृक्ष से पत्ते झड़ जाने के बाद वो पत्ते पुनः नहीं लगाए जा सकते धिक् उसी प्रकार मनुष्य का जीवन भी आप को बार- बार नहीं मिलता है इसलिए आप मनुष्य का जीवन पाकर आप अपने आपको बहुत ही सौभाग्य समझो और ईष्वर को धन्यवाद दो और इसलिए आप अपने जीवन का उचित उपयोग करे, उसको व्यर्थ न जाने दे।

06. कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आई।
बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी-चुनी खाई।

अर्थ: (Download Kabir Ke Dohe in Hindi Pdf) कबीर दस जी का कहना है कि समुद्र में लहरे मोती अपने साथ नोटि लेकर बिखेर देती है एक ओर जिनको बगुला भेदना नहीं जनता वंही दूसरी तरफ हंस उन्हें चुन चुन कर खा रहा है इससे हमें यह सीखने को मिलता है कि कोई भी चीज व्यर्थ नहीं होती है बस उसके हल को समझना होता है।

07. बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

अर्थ: कबीर दास जी कहते है कि जब मैं बुराई को खोजने निकला तो मुझे कोई भी बुरा व्यक्ति नहीं मिला और जब मैंने खुद के अंदर झांक कर देखा तो पता चला कि इस दुनिया में तो मुझसे ज्यादा बुरा इंसान कोई भी नहीं है अर्थात इसका मतलब यह है कि व्यक्ति को किसी दूसरे व्यक्ति के अंदर बुराई निकलने से पहले अपने अंदर छुपी बुराई को देखना चाहिए और उसे सुधारना चाहिए उसके बाद किसी दूसरे के अंदर झांकना चाहिए।

08. तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।

अर्थ: इस दोहे में कबीर दास जी ये कहना चाहते है कि मनुष्य को कभी भी उसके पैर के नीचे आने वाले तिनके कि भी निंदा नहीं करनी चाहिए क्योंकि जब वही तिनका उस कर मनुष्य के आंख में जाता है तब बहुत ज्यादा हानि पहुंचाता है अर्थात इसका मतलब है कि कभी भी किसी को अपने से छोटे व्यक्ति को परेशान या उसकी बेइज्जती नहीं करनी चाहिए।

09. माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।

अर्थ: कबीर दास जी इस दोहे के माध्यम से यह बताना चाहते है कि जो लोग यह सोचते है कि हाथ में मोतियों कि माला लेकर उसे एक लंम्बे समय तक घुमाने से उसके मन के भाव बदल जायेंगे तो ये असंभव है क्योंकि अगर मोतियों कि माला लेकर मन के भाव को बदला जा सकता है तो इसके जरिए हर कोई अपने मन के भाव को बदल ले।  अर्थात इसका मतलब यह है कि लोगो को मोतियों की माला कि जगह उन्हें अपने मन कि मोतियों को घुमाना चाइये जिससे कि उसका मन शांत और स्थिर होगा।

10. जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।

अर्थ: कबीर दास जे का कहना है कि इस दुनिया में बहुत लोग कुछ पाने की इच्छा तो रखते है लेकिन उसको पाने के लिए पूरा प्रयाश नहीं करते है और जो लोग उसे पाने के लिए निरंतर प्रयत्न करते है उन लोगो को कुछ न कुछ हासिल जरूर होता है जैसे कि गोताखोर पानी में गहराई तक जाता है । और वंहा से कुछ न कुछ लेकर जरूर आता है लेकिन वंही कुछ लोग अपने जीवन में बहुत कुछ पाने कि इच्छा तो रखते है । (Kabir Ke Dohe in Hindi Pdf)

लेकिन उसको पाने का प्रयाश नहीं करते है जिस प्रकार कुछ लोग पानी में डूब जाने के दर से नहीं कूदते है है उन लोगो को कुछ भी प्राप्त नहीं होता है । हमारे यंहा एक कहावत है कि “कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है” युद्ध जीतने के लिए मैदान में कूदना पड़ता है इसलिए आप जिस भी चीज को पाने कि इच्छा रखेत है उसको पाने के लिए आज से प्रयत्न करना शुरू कर दे।

11.पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

अर्थ: कबीर दास जी कहतइ हहि कि लोग पुस्तके पढ़कर कभी भी विद्वान् नहीं बनते है क्योंकि बहुत सरे लोग बड़ी बड़ी किताबे बढ़कर मृत्यु को प्राप्त हो गए और एक अच्छे विद्वान् नहीं बन पाए लेकिन वही जो लोग प्रेम शब्द के ढाई अक्षर के मतलब को अच्छी तरही से समझ गए उन लोगो से बड़ा कोई विद्वान् नहीं इसका मतलब यह है कि लोगो को किताबी ज्ञान के साथ साथ प्रेम सब्द के वास्तविक अर्थ को समझना चाहिये।

12. लंबा मारग दूरि घर, बिकट पंथ बहु मार।
कहौ संतों क्यूं पाइए, दुर्लभ हरि दीदार॥

अर्थ: संत कबीर दास जी का मानना है कि मंजिल तक जाने वाला रास्ता बहुइट ही लम्बा है और उस रास्ते में बहुत से चोर उचक्के बैढे हुए है इस प्रकार मंजिल का रास्ता बहुत ही कठिन है और कबीर कहते है कि बहुत से सज्जन लोग भगवान् के दर्शन तो प्राप्त करना चाहते है वो लोग उस रास्ते में पड़ने वाली बधाओ और विपत्तियों में पड़कर चकराए रहते है और बहुत सी आकर्षक दिखने वाली चीजों कि ओरअपना ध्यान भटकाते रहते है और अपने लक्ष्य को भुला देते है । Download Kabir Ke Dohe in Hindi Pdf

और उसको पाने कि चाह में अपना सारा धन भी गँवा देते है अर्थात उन सज्जन लोगो को जो अपना लक्ष्य प्राप्त करना चाहते है, रास्ते में आने वाली साडी बधाओ को चीरते हुए अपने लक्ष्य कि तरफ अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए और उसके पाने तक लगे रहना चाहिए।

13. कबीर कहा गरबियौ, ऊंचे देखि अवास ।
काल्हि परयौ भू लेटना ऊपरि जामे घास॥

अर्थ: (Kabir Ke Dohe in Hindi Pdf) कबीर दास जी कहते है कि मनुष्य को कभी भी ऊँची ऊँची इमारते देखकर कभी भी घमंड नहीं करना चाहिए क्योंकि भविष्य में आप भी मृत्यु को प्राप्त होकर मिटटी में ही मिल जायेंगे और साथ ही ये ऊँची ऊँची इमारंते भी जमीन में पड़ी मिलेंगी और उनके ऊपर घास भी उग आएगी और जो आपका हँसता हुआ घर का आंगन है वो भी सुनसान हो जायेग। इस दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति खाली हाथ आया है और खाली हाथ ही जायेगा। इस लिए मनुष्य को कभी भी किसी पर भी घमंड नहीं करना चाहिए।

Conlusion (Kabir Ke Dohe in Hindi Pdf)

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